पेशाब की थैली (मूत्राशय) में कैंसर के लक्षण और उपचार

23 June, 2023
मूत्राशय कैंसर के लक्षण, कारण और बचाव
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    पेशाब की थैली / यूरिन ब्लैडर हमारे शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक है। यह पेशाब को संग्रहित करता है और उसे नियमित रूप से निकालता है। पेशाब की थैली में कैंसर एक गंभीर समस्या है जिसमें थैली के अंदर असामान्य ग्रोथ होती है। मूत्राशय कैंसर (Bladder Cancer) की शुरुआत ज़्यादातर थैली की अंदरूनी परत की कोशिकाओं से होती है, और इसीलिए इसके संकेत सबसे पहले पेशाब में ही दिखाई देते हैं। इस ब्लॉग में हम पेशाब की थैली में कैंसर के लक्षण और इलाज के बारे में चर्चा करेंगे।

    पेशाब की थैली में कैंसर के लक्षण

    मूत्राशय कैंसर के लक्षण शुरुआत में हल्के होते हैं और अक्सर किसी आम इन्फेक्शन जैसे लगते हैं, इसलिए इन्हें पहचानना ज़रूरी है। पेशाब की थैली में कैंसर के कुछ सामान्य लक्षण हो सकते हैं। इनमें से कुछ मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:

    • पेशाब करते समय दर्द या बेचैनी का अनुभव

    • पेशाब में रक्त की मिश्रण के साथ दर्द या बेचैनी

    • अत्यधिक पेशाब करने की आवश्यकता या अक्षमता

    • पेशाब में बदबू या असामान्य रंग का परिवर्तन

    • यूरिन का बार-बार निकलना या नियमित रूप से अवसाद होना

    मूत्राशय कैंसर के कारण और जोखिम कारक

    मूत्राशय कैंसर के लक्षण दिखने से पहले यह जान लेना उपयोगी है कि किन लोगों को इसका खतरा ज़्यादा रहता है। मूत्राशय कैंसर किसी एक वजह से नहीं होता। कुछ आदतें और परिस्थितियां इसका खतरा बढ़ा देती हैं, और इन्हें जानना बचाव की पहली सीढ़ी है।

    • धूम्रपान: यह सबसे बड़ा जोखिम कारक है। तंबाकू के हानिकारक तत्व खून के रास्ते किडनी तक पहुंचते हैं और पेशाब में जमा होकर थैली की परत को नुकसान पहुंचाते हैं।

    • केमिकल के संपर्क में रहना: रंग, डाई, रबर, चमड़ा और पेंट उद्योग में काम करने वालों को औद्योगिक केमिकल्स से खतरा ज़्यादा रहता है।

    • बार-बार यूरिन इन्फेक्शन: लंबे समय तक चलने वाला संक्रमण या जलन थैली की परत को बार-बार नुकसान पहुंचाती है।

    • उम्र: ज़्यादातर मामले 55 साल की उम्र के बाद सामने आते हैं।

    • लिंग: पुरुषों में यह खतरा महिलाओं की तुलना में लगभग तीन गुना ज़्यादा देखा जाता है।

    • पारिवारिक इतिहास: परिवार में किसी को मूत्राशय कैंसर रहा हो, तो खतरा बढ़ जाता है।

    • पहले ली गई रेडिएशन थेरेपी: पेट या पेल्विक हिस्से में पहले रेडिएशन लिया हो, तो जोखिम अधिक रहता है।

    मूत्राशय कैंसर के चरण (Stages)

    इलाज का तरीका इस बात पर तय होता है कि कैंसर किस चरण में है।

    • स्टेज 0: कैंसर सिर्फ थैली की अंदरूनी परत की सतह तक सीमित रहता है।

    • स्टेज I: कैंसर परत में गहरा उतर जाता है, लेकिन मांसपेशी तक नहीं पहुंचता।

    • स्टेज II: कैंसर थैली की मांसपेशी में फैल जाता है।

    • स्टेज III: कैंसर थैली से बाहर निकलकर आसपास के टिश्यू तक पहुंच जाता है।

    • स्टेज IV: कैंसर दूर के अंगों जैसे लिम्फ नोड्स, लिवर, फेफड़े या हड्डियों तक फैल जाता है।

    शुरुआती चरण में पकड़ा गया कैंसर आमतौर पर बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है, इसलिए लक्षण दिखते ही जांच करानी चाहिए।

    पेशाब की थैली में कैंसर का इलाज

    पेशाब की थैली में कैंसर के इलाज के लिए विभिन्न विकल्प मौजूद हैं। इलाज का चयन तत्परता के आधार पर किया जाता है। कुछ प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं:

    1. सर्जरी:

    पेशाब की थैली के कैंसर के मामलों में, सर्जरी सबसे सामान्य इलाज हो सकता है। इसमें पेशाब की थैली को पूरी या भागीदारी तटस्थ कर दिया जाता है। यह इलाज तत्काल परिणाम देता है और कैंसर को नष्ट करने में मदद कर सकता है। पेशाब की थैली का ऑपरेशन कितना बड़ा होगा, यह कैंसर के चरण पर निर्भर करता है। कई मामलों में ऑपरेशन के बाद कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी भी दी जाती है ताकि बची हुई कोशिकाएं खत्म की जा सकें।

    2. रेडिएशन थेरेपी:

    रेडिएशन थेरेपी उपचार के रूप में उपयोग की जाती है जब कैंसर को पूरी तरह से हटाना संभव नहीं होता है। इसमें उच्च-तरंगता विकिरण का उपयोग किया जाता है जो कैंसर को मारने में मदद करता है।

    3. कीमोथेरेपी:

    कीमोथेरेपी कैंसर के इलाज की एक प्रमुख पद्धति है, जिसमें ऐसी दवाओं का उपयोग किया जाता है जो कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने या उनकी वृद्धि को रोकने में मदद करती हैं। ये दवाएं मरीज की स्थिति के अनुसार इंजेक्शन, ड्रिप (IV), या गोलियों के रूप में दी जा सकती हैं।

    4. पेशाब की थैली में गांठ का इलाज

    अगर पेशाब की थैली में गांठ मिलती है, तो इलाज उसके आकार और जांच के नतीजों पर तय होता है। गांठ छोटी हो और कैंसर का संदेह न हो, तो डॉक्टर दवाओं से इसे घटाने की कोशिश करते हैं। गांठ बड़ी हो या कैंसर की आशंका हो, तो सर्जरी के ज़रिए गांठ या थैली का प्रभावित हिस्सा हटाया जाता है।

    निदान कैसे होता है

    पेशाब की थैली में कैंसर की पुष्टि सिर्फ लक्षणों से नहीं होती। डॉक्टर कुछ जांचों के ज़रिए इसकी पहचान करते हैं।

    • यूरिन टेस्ट: पेशाब में खून और असामान्य कोशिकाओं की जांच की जाती है।

    • यूरिन साइटोलॉजी: माइक्रोस्कोप की मदद से पेशाब में कैंसर कोशिकाओं को खोजा जाता है।

    • सिस्टोस्कोपी: एक पतली ट्यूब में लगे कैमरे से थैली के अंदर देखा जाता है।

    • बायोप्सी: संदिग्ध हिस्से से टिश्यू का सैंपल लेकर लैब में जांच की जाती है। यही जांच कैंसर की पक्की पुष्टि करती है।

    • सीटी या एमआरआई स्कैन: कैंसर का आकार और वह कहां तक फैला है, यह देखा जाता है।

    इनमें से कौन सी जांच ज़रूरी है, यह डॉक्टर लक्षणों और शुरुआती रिपोर्ट देखकर तय करते हैं। अकेले यूरिन टेस्ट से कैंसर की पुष्टि नहीं होती, इसके लिए बायोप्सी ज़रूरी होती है।

    मूत्राशय की दूसरी समस्याएं जो कैंसर नहीं हैं

    हर यूरिन ब्लैडर प्रॉब्लम कैंसर नहीं होती। कुछ आम समस्याएं ऐसी हैं जिनके लक्षण मिलते-जुलते होते हैं, लेकिन वजह अलग होती है।

    • पेशाब की थैली में सूजन: इसे सिस्टाइटिस कहते हैं और यह ज़्यादातर संक्रमण से होती है। इसमें पेशाब करते समय जलन, बार-बार पेशाब आना और कभी-कभी खून भी दिख सकता है। पेशाब की थैली में सूजन का घरेलू उपाय आमतौर पर ज़्यादा पानी पीना, कैफीन और मसालेदार खाना कम करना होता है, लेकिन ये उपाय जांच की जगह नहीं ले सकते।

    • कमज़ोर थैली: उम्र या मांसपेशियों की कमज़ोरी की वजह से पेशाब रोकने में दिक्कत होती है। केगल (Kegel) व्यायाम और नियमित रूप से बाथरूम जाना मदद करते हैं।

    ध्यान रखें कि यूरिन ब्लैडर की समस्या चाहे जो भी हो, अगर पेशाब में खून दिखे या तकलीफ कुछ दिनों में ठीक न हो, तो खुद इलाज करने के बजाय डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है।

    रोकथाम और बचाव

    मूत्राशय कैंसर को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ आदतें इसका खतरा काफी कम कर देती हैं।

    • धूम्रपान छोड़ें। यह सबसे बड़ा और सबसे असरदार कदम है।

    • काम के दौरान केमिकल के संपर्क में आते हों, तो सुरक्षा उपकरण और दस्ताने ज़रूर पहनें।

    • दिन भर भरपूर पानी पीएं, ताकि हानिकारक तत्व पेशाब के साथ बाहर निकलते रहें।

    • फल और हरी सब्जियां नियमित रूप से खाएं।

    • उम्र 55 के पार हो या परिवार में कैंसर का इतिहास हो, तो नियमित हेल्थ चेक-अप कराते रहें।

    इन आदतों से खतरा घटता है, पूरी तरह खत्म नहीं होता। इसीलिए बचाव के साथ-साथ लक्षणों पर नज़र रखना भी उतना ही ज़रूरी है।

    निष्कर्ष

    मूत्राशय कैंसर के लक्षण अक्सर मामूली लगते हैं, और यही इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती है। इसमें सबसे बड़ा फर्क समय पर पकड़े जाने से पड़ता है। शुरुआती चरण में मिलने पर इलाज के विकल्प ज़्यादा होते हैं और नतीजे बेहतर रहते हैं। दिक्कत यह है कि लोग शुरुआती संकेतों को आम इन्फेक्शन समझकर महीनों इंतज़ार कर लेते हैं। पेशाब में खून दिखे, जलन बनी रहे, या बार-बार पेशाब जाने की ज़रूरत महसूस हो, तो इसे टालें नहीं। एक यूरिन टेस्ट से शुरुआत होती है, और यही एक कदम सबसे ज़्यादा मायने रखता है।

    अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

    प्रश्न: क्या मूत्राशय कैंसर ठीक हो सकता है?

    हां, खासकर तब जब यह शुरुआती चरण में पकड़ा जाए और कैंसर अभी थैली की परत तक ही सीमित हो। ऐसे मामलों में इलाज के बाद ज़्यादातर लोग सामान्य जीवन जीते हैं। हालांकि इस कैंसर के दोबारा लौटने की आशंका रहती है, इसलिए इलाज के बाद भी नियमित फॉलो-अप जांच ज़रूरी होती है।

    प्रश्न: ब्लैडर कैंसर किस उम्र में होता है?

    यह किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन ज़्यादातर मामले 55 साल की उम्र के बाद सामने आते हैं। उम्र बढ़ने के साथ खतरा भी बढ़ता जाता है। यही वजह है कि इस उम्र के बाद पेशाब से जुड़ी किसी भी लगातार तकलीफ को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

    प्रश्न: क्या पेशाब में खून हमेशा कैंसर का संकेत है?

    नहीं। पेशाब में खून आने की सबसे आम वजहें यूरिन इन्फेक्शन, किडनी की पथरी, प्रोस्टेट की समस्या और चोट होती हैं। लेकिन यह मूत्राशय कैंसर का पहला और कई बार अकेला संकेत भी हो सकता है, जिसमें दर्द नहीं होता। इसलिए एक बार भी खून दिखे तो जांच ज़रूरी है।

    प्रश्न: ब्लैडर कैंसर में जीवित रहने की संभावना कितनी होती है? 

    यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर किस चरण में पकड़ा गया। स्टेज 0 और स्टेज I में पकड़े जाने पर नतीजे काफी अच्छे रहते हैं, जबकि दूर के अंगों तक फैल जाने पर इलाज मुश्किल हो जाता है। आपके अपने मामले में क्या उम्मीद रखनी चाहिए, यह सिर्फ आपके डॉक्टर जांच रिपोर्ट देखकर बता सकते हैं।

    प्रश्न: क्या महिलाओं को भी ब्लैडर कैंसर होता है?

    हां, हालांकि पुरुषों की तुलना में कम। एक दिक्कत यह है कि महिलाओं में पेशाब में खून आने को अक्सर यूरिन इन्फेक्शन या पीरियड्स से जोड़ दिया जाता है, जिससे जांच में देरी हो जाती है। इसलिए महिलाओं को भी ऐसे लक्षणों पर उतनी ही सतर्कता बरतनी चाहिए।

    Written By:- Team Nobel Hygiene